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भरत चक्रवर्ती

प्रथम चक्रवर्ती सम्राट — जिनके नाम पर भारत का नाम पड़ा

जन्म एवं परिवार

भरत चक्रवर्ती का जन्म अवसर्पिणी काल के चौथे काल दुषमा-सुषमा में हुआ। इनके पिता अयोध्या के राजा भगवान ऋषभदेव और माता रानी नंदा थीं। इनकी जुड़वा बहन ब्राह्मी थीं। इनके अठानवे भाई थे, सभी इसी जन्म में मोक्ष प्राप्त करने वाले चरमशरीरी थे।

राज्य और प्रारंभिक जीवन

पिता से राज्य विरासत में मिला। एक साथ तीन शुभ समाचार मिले — चक्ररत्न, पुत्ररत्न, और पिता भगवान ऋषभदेव का केवलज्ञान प्राप्त होना। भरत ने ऋषभदेव के केवलज्ञान की 108 नामों से प्रथम स्तुति की।

सेना और विजय

इनकी सेना छह प्रकार की थी — हस्ति, अश्व, रथ, पदाति, दिव्य और विद्याधर। इस सेना के आगे दंडरत्न चलता था और पीछे चक्ररत्न। विद्याधर नामी की बहन सुभद्रा से विवाह के बाद पूर्व दिशा की ओर विजय अभियान प्रारंभ किया।

दक्षिण और पश्चिम के देवताओं और राजाओं को जीतकर उत्तर की ओर बढ़े और अंततः समस्त उत्तर भारत को जीत लिया। साठ हजार वर्षों के बाद अयोध्या लौटे — भरतक्षेत्र के सभी छह खंडों पर विजय प्राप्त कर चुके थे।

भाईयों से संघर्ष और बाहुबली

लौटने पर सुदर्शन चक्र अयोध्या में प्रवेश नहीं कर पाया। मंत्री बुद्धिसागर ने बताया कि ऐसा इसलिए है क्योंकि भाईयों ने उनकी अधीनता स्वीकार नहीं की। भरत ने उनके पास दूत भेजे।

अन्य भाईयों ने (जिन्होंने आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त कर लिया था) सांसारिक जीवन का त्याग कर पिता ऋषभदेव से दीक्षा ले ली; किंतु बाहुबली ने ऐसा नहीं किया। बाहुबली ने भरत के साथ दृष्टियुद्ध, जलयुद्ध और मल्लयुद्ध (कुश्ती) किया — तीनों में भरत विजयी रहे। भरत ने बाहुबली पर सुदर्शन चक्र भी चलाया, किंतु वह बाहुबली को हानि नहीं पहुँचा सका। अंततः बाहुबली ने राज्य का त्याग कर कैलाश पर्वत पर तपस्या आरंभ की। फलस्वरूप भरत को समस्त पृथ्वी पर एकछत्र राज्य प्राप्त हुआ।

रत्न, सिद्धियाँ और साम्राज्य

भरत ने ब्राह्मण वर्ण की स्थापना की। इनके चौदह रत्न थे — चक्र, छत्र, खड्ग, दंड, काकिनी, मणि, चर्म, सेनापति, गृहपति, हस्ति, अश्व, पुरोहित, स्थापति और स्त्री; आठ सिद्धियाँ और नौ निधियाँ

बत्तीस हजार मुकुटधारी राजा और उनके राज्य इनके अधीन थे। छियानवे हजार रानियाँ, अथाह धन — एक करोड़ हल, तीन करोड़ कामधेनु गायें, अठारह करोड़ घोड़े, चौरासी लाख हाथी और रथ। पाँच सौ चरमशरीरी पुत्र, जिनमें अर्ककीर्ति और विवर्धन आज्ञाकारी थे।

दस प्रकार के भोग — पूजा/गान, भोजन, शय्या, सेना, वाहन, आसन, निधि, रत्न, नगर और नाटक। विविध आभूषण और दिव्य चिह्न; वक्ष पर श्रीवत्स चिह्न और चौंसठ कल्याणक लक्षणों से युक्त शरीर।

राज्य में बहत्तर हजार नगर, छियानवे करोड़ गाँव, निन्यानवे हजार द्रोणमुख, अड़तालीस हजार पट्टन, सोलह हजार खेट, छप्पन अंतर्द्वीप, चौदह हजार संवाह।

आध्यात्मिक मार्ग और मोक्ष

नौ सौ तेईस राजकुमारों (विवर्धन सहित) ने ऋषभदेव की दिव्य सभा (समवसरण) में संयम स्वीकार किया। स्वयंवर प्रथा का उद्गम इनके साम्राज्य में हुआ। लंबे समय तक सांसारिक समृद्धि का भोग करने के बाद इन्होंने अर्ककीर्ति को राज्य सौंपकर जैन दीक्षा ली। केशलोच (केश उत्पाटन) के तुरंत बाद ही केवलज्ञान प्राप्त हो गया। केवलज्ञान की इंद्रादि देवताओं ने पूजा की।


भारत नाम की उत्पत्ति

भरतक्षेत्र का 'भारत' यह नामकरण इन्हीं भरत चक्रवर्ती के नाम पर हुआ था। भगवान ऋषभदेव (वृषभदेव) के इस पुत्र ने समस्त पृथ्वी पर चक्रवर्ती सम्राट के रूप में शासन किया और इस भूभाग को सदैव के लिए 'भारत' नाम दिया।

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