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बाहुबली

परम शक्ति और त्याग का प्रतीक — अवसर्पिणी में मोक्ष पाने वाले प्रथम

परिचय एवं कुल

बाहुबली भगवान ऋषभदेव और द्वितीया रानी सुनंदा के पुत्र तथा सुंदरी के भाई हैं। सौंदर्य के कारण इन्हें कामदेव कहा जाता था। ये चरमशरीरी (मोक्ष से पूर्व अंतिम जन्म) थे और पोदनपुर के राजा थे। इनके पुत्र सोम्यश चंद्रवंश के संस्थापक थे। (संदर्भ: महापुराण 16.4-25, 17.77, 34.68; पद्मपुराण 5.10-11; हरिवंशपुराण 9.22)

भरत से संघर्ष और त्याग

स्वाभिमान के कारण बाहुबली ने भाई भरत की अधीनता स्वीकार नहीं की। उन्होंने भरत को तीन प्रकार के युद्धों में पराजित किया — जलयुद्ध, दृष्टियुद्ध और बाहुयुद्ध (मल्लयुद्ध)। क्रोध में भरत ने बाहुबली पर चक्र फेंका, किंतु वह बाहुबली पर कोई प्रभाव नहीं डाल सका।

राज्य के लिए भाई का ऐसा व्यवहार देखकर बाहुबली का संसार से वैराग्य हो गया। उन्होंने राज्य का त्याग कर पुत्र महाबली को सौंप दिया और दीक्षा ले ली।

तपस्या और केवलज्ञान

बाहुबली ने कठोर तपस्या की — प्रतिमायोग (एक वर्ष तक निराहार-निर्जल खड़े रहने की स्थिति) धारण किया। तप के दौरान पैरों के चारों ओर सर्पों ने बिल बना लिए, बाल कंधों तक लंबे हो गए और शरीर पर बेलें लिपट गईं।

तपस्या पूर्ण होने पर भरत ने आकर उनकी पूजा की। उसी क्षण बाहुबली को केवलज्ञान प्राप्त हो गया। इंद्रादि देवताओं ने भी उनकी पूजा की। अंत में विहार करते हुए वे तीर्थंकर आदिनाथ के निकट कैलाश पर्वत पर गए। वहाँ शेष कर्मों का क्षय करके उन्होंने सिद्ध पद (मोक्ष) प्राप्त किया। बाहुबली अवसर्पिणी काल में मोक्ष पाने वाले प्रथम हैं। (संदर्भ: महापुराण 36.51-203; पद्मपुराण 4.77; हरिवंशपुराण 11.98-102)


भवावली — पूर्व जन्म

पूर्व भव में बाहुबली एक सेनापति थे; तत्पश्चात् क्रमशः भोगभूमि में, आर्यभंकरदेव, अकंपन, अहमिंद्र, महाबाहु, पुनः अहमिंद्र और अंत में बाहुबली के रूप में जन्म। (महापुराण 47.365-366)

पूर्व जन्मों का विवरण

स्रोत: जैनकोश.org

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